इग्नू रजिस्ट्रार और केंद्र को हाईकोर्ट का नोटिस+++शिक्षक शिविरों के विरोध में उतरे बच्चों के अभिभावक+++पदोन्नति केस मांगने के बाद भी नहीं हो रही रिक्तियां पूरी

विभूति कुमार रस्तोगी, नई दिल्ली : इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) में नियम ताक पर रखकर अयोग्य व्यक्ति को कार्यवाहक कुलपति बनाने का विवाद दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया है। विश्वविद्यालय के एक डिप्टी डायरेक्टर की याचिका पर हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार को सभी मूल दस्तावेजों के साथ व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित होने का आदेश दिया है। साथ ही केंद्रीय मानव संसाधन व विकास मंत्रालय को भी नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है। दो फरवरी को रजिस्ट्रार और मंत्रालय को कोर्ट में अपना जवाब देना होगा। इग्नू के कुलपति रहे प्रो. राजशेखरन पिल्लई 20 अक्टूबर 2011 को सेवानिवृत्त हो गए। नियमानुसार कुलपति की सेवानिवृत्ति पर सीनियर प्रो वाइस चांसलर कार्यवाहक कुलपति के रूप में तब तक काम करेगा, जब तक स्थायी कुलपति नहीं मिल जाता। विश्वविद्यालय में पांच प्रोवीसी थे। नियम के अनुसार प्रो. पिल्लई के बाद सीनियर प्रोवीसी को कार्यवाहक कुलपति बनाया जाना चाहिए था। लेकिन रजिस्ट्रार उदय सिंह तुलिया ने विश्वविद्यालय के डायरेक्टर प्रो. एम. असलम को इग्नू का कार्यवाहक कुलपति बना दिया।

शिक्षक शिविरों के विरोध में उतरे बच्चों के अभिभावक

सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को सर्व शिक्षा अभियान के तहत सात दिवसीय शिविरों के माध्यम से स्कूल समय के दौरान दी जा रही ट्रेनिंग का अभिभावकों ने विरोध करना शुरू कर दिया है। ट्रेनिंग के लिए प्रति स्कूल से 8 से 9 अध्यापकों को यानि 60 अध्यापक स्कूल समय में 9 से 3 ़30 बजे तक ट्रेनिंग ले रहे है। अध्यापक स्कूल समय में विद्यार्थियों को पढ़ाने की खुद ट्रेनिंग में व्यस्त हैं। विद्यार्थी स्कूल में अपने सिलेबस को पूरा करने के लिए अध्यापकों की राह ताक रहे है। जबकि मार्च माह के प्रथम सप्ताह से विद्यार्थियों की बोर्ड परीक्षाएं आरंभ होने जा रही है। अभिभावकों का कहना है कि विभाग द्वारा थोपे जा रहे ट्रेनिंग शिविरों का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पढ़ रहा है। शिक्षा विभाग की गलत नीतियों ने सरकारी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों की पढ़ाई को चौपट कर दिया है। सरकार व शिक्षा विभाग द्वारा प्रतिदिन किए जा रहे प्रयोग विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए घातक सिद्ध हो रहे है। अध्यापकों को शिक्षा नीति के बारे में ट्रेनिंग देनी है तो वह छुट्टियों के दौरान देनी चाहिए ताकि बच्चों की पढ़ाई चौपट न हो और अध्यापकों का समय भी पास हो सके। एक साल में 365 दिन होते है और छुट्टियां लगभग 200 हो जाती है। शेष बचे 165 दिनों में से अध्यापकों की छुट्टियों को निकाल दे तो विद्यार्थियों को साल में परीक्षाओं की तैयार करने के लिए लगभग 60 दिन ही मिल पाते है। ऐसे में विद्यार्थी अपने दो सेमेस्टरों की परीक्षाओं की तैयारी करे भी तो करे कैसे। स्कूलों में बढ़ती छुट्टियां व समय-समय पर औपचारिकताएं पूरी करने के लिए शिविर,रैलियां व खेल विद्यार्थियों की शिक्षा में एक सबसे बड़ी बांधा बनते जा रहे है। शिविरों से अभिभावक व विद्यार्थी भी परेशान आ चूके है जिसके अभिभावकों ने इसका जमकर विरोध करना शुरू कर दिया है। अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा व भविष्य को लेकर काफी चिंतित है। अभिभावक कृष्ण, किरण, संतोष, महेश का कहना है कि सरकारी स्कूलों की इतनी अधिक छुट्टियों, शिविरों व मिड-डे मील ने विद्यार्थियों की शिक्षा का बेड़ा गर्क कर दिया है। सरकारी जितने भी विभाग है उन सब में सबसे अधिक छुट्टियां सरकारी स्कूलों में हो रही है। सरकार व विभाग को चाहिए कि वह शिविर स्कूल समय में न लगवाए और छुट्टियों पर अंकुश लगाए।
अध्यापकों की आकस्मिक व अर्जित छुट्टियां : एक साल में एक अध्यापक 10 आकस्मिक व 10 अर्जित अवकाश के रूप में छुट्टियां ले सकता है। इसके अलावा जिस अध्यापक की सर्विस 10 साल की वह 10 दिन, जिसकी सर्विस 15 साल की हो गई है वह 15 दिन की और जिसकी सर्विस 20 साल की हो गई है वह एक साल में 20 छुट्टियां ले सकता है। भुगत रहे हैं खामियाजा: विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थी नितिन, रमेश, प्रवीण, सचिन, कमल, विनोद का कहना है कि एक तो छुट्टियां इतनी हो जाती है कि उनका सिलेबस पूरा नहीं हो पाता दूसरा शिविरों व अध्यापकों की छुट्टियां से उनकी पढ़ाई बाधित हो रही है जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है।
पदोन्नति केस मांगने के बाद भी नहीं हो रही रिक्तियां पूरी
जींद, जागरण संवाद केंद्र : मिडिल स्कूलों में मुख्य अध्यापक के पद पर पदोन्नति देने के लिए शिक्षा विभाग ने तीन बार आवेदन मांगे, लेकिन उसके बावजूद रिक्तियां पूरी नहीं हो सकी है। इसके चलते विभाग ने फिर से सभी जिला शिक्षा अधिकारियों और जिला मौलिक शिक्षा अधिकारियों को पत्र जारी करके दोबारा केस मांगे हैं। पत्र में 15 मार्च 2010 और 10 जनवरी 2012 को मुख्य अध्यापक पद पर पदोन्नति के लिए जारी किए गए पत्रों का हवाला दिया गया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि मास्टर वर्ग की वरिष्ठता क्रमांक 4300 तथा हिंदी और पंजाबी के ऐसे अध्यापकों के पदोन्नति मामले मांगे गए थे जिनकी सेवाएं वर्ष 1991 तक नियमित हुई थी। संबंधित जिला शिक्षा अधिकारियों ने केस भी भेजे लेकिन इसके बावजूद रिक्तियां पूरी नहीं हो सकी। इसके बाद पदोन्नति हेतु भेजे गए मामलों में से वरिष्ठता क्रमांक 4700 तक के मामले निदेशालय की संबंधित शाखा से लिए गए, लेकिन उसके बाद भी रिक्तियां पूरी नहीं हो सकी। निदेशालय ने इसके बाद फिर से संबंधित शाखा से 5200 वरिष्ठता क्रमांक तक के मास्टरों को मुख्याध्यापक उच्च विद्यालय के लिए केस 16 जनवरी तक सभी शिक्षा अधिकारियों से मांगे थे, लेकिन इस तरफ अधिकतर अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया और न ही कोई केस निदेशालय के पास भेजा। हिंदी विषय के पद शेष रहने के कारण वर्ष 31 दिसंबर 1998 तक नियमित हुए सभी हिंदी अध्यापक, जो बीए व बीएड की योग्यता रखते थे, के मामले भी 16 जनवरी तक मांगे गए थे, लेकिन किसी ने कोई सूचना नहीं भेजी। इस मामले में अब निदेशालय ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों और जिला मौलिक शिक्षा अधिकारियों को पत्र जारी करके दोबारा केस भेजने का निर्देश दिया है।

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