नई दिल्ली : किसी भी प्राइवेट स्कूल को इस बात की अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह बच्चों को स्कूल में दाखिला देने के लिए मानक तय करे। यह टिप्पणी दिल्ली उच्च न्यायालय ने नर्सरी दाखिला प्रक्रिया को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी मुरूगेसन व जस्टिस वीके जैन की खंडपीठ ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय और दिल्ली सरकार को कहा कि प्राइवेट स्कूल को अपने दाखिला मानक तय करने की छूट देकर एक तरह से बच्चों को दिए जाने वाले शिक्षा के अधिकार का हनन कर रहे हैं। इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 23 नवंबर 2010 को एक नोटिफिकेशन जारी किया था। जिसमें प्राइवेट स्कूलों को अपने दाखिला मानक तय करने की छूट दी गई थी। दिल्ली सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी कर प्राइवेट स्कूलों को यह छूट प्रदान की थी। उच्च न्यायालय ने कहा कि पूरी दाखिला प्रक्रिया रद हो जाएगी, अगर अदालत दिल्ली सरकार द्वारा 15 दिसंबर 2010 को जारी किए गए नोटिफिकेशन को रद कर देती है। इस नोटिफिकेशन में प्राइवेट स्कूलों को छूट दी गई थी कि वे अपनी इच्छा से स्कूल में दाखिला मानक तय कर सकते हैं। उल्लेखनीय है कि नर्सरी दाखिला प्रक्रिया के संबंध में समानता के अधिकार को लेकर अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने एक जनहित याचिका उच्च न्यायालय में दायर की थी। याचिकाकर्ता ने बुधवार को कहा कि निजी स्कूलों ने दाखिलों के लिए अपने अलग-अलग मानक तय कर लिए हैं। इससे दाखिलों में भेदभाव शुरू हो गया। निजी स्कूल मनमानी कर रहे है। वहीं शिक्षा के अधिकार कानून की शिक्षा के अधिकार के सेक्शन 13 में स्पष्ट उल्लेख है कि नेबरहुड मुद्दे को छोड़कर किसी भी बच्चे से दाखिले में भेदभाव नहीं किया जाएगा। यानि हर बच्चे को समान रूप से दाखिला पाने का अधिकार है। खंडपीठ ने उनके तर्को पर सहमति जताते हुए केंद्र व दिल्ली सरकार के अधिवक्ता से कहा सेक्शन 13 में स्पष्ट है कि दाखिलों में भेदभाव नहीं किया जाएगा और सभी को दाखिला लेने का अधिकार है। अत: किसी भी प्राइवेट स्कूल को स्वयं से दाखिला मानक तय करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। खंडपीठ ने याची से भी पूछा कि क्या वे वर्तमान में हो रहे दाखिलों पर भी आपत्ति कर रहे है या नहीं। अग्रवाल ने कहा वर्तमान दाखिलों पर वे आपत्ति नहीं कर रहे क्योंकि अधिकांश दाखिले हो चुके हैं। उन्होंने कहा भविष्य में होने वाले दाखिलों के लिए सरकार दिशा-निर्देश तय करे। उधर, इस मामले में एडिशनल सॉलीसिटर जनरल राजीव मेहरा ने कहा कि इस संबंध में एक मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी विचाराधीन है। भी 15 दिसंबर 2010 को इसी तरह का
निजी स्कूल नहीं कर सकते मानक तय
नई दिल्ली : किसी भी प्राइवेट स्कूल को इस बात की अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह बच्चों को स्कूल में दाखिला देने के लिए मानक तय करे। यह टिप्पणी दिल्ली उच्च न्यायालय ने नर्सरी दाखिला प्रक्रिया को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी मुरूगेसन व जस्टिस वीके जैन की खंडपीठ ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय और दिल्ली सरकार को कहा कि प्राइवेट स्कूल को अपने दाखिला मानक तय करने की छूट देकर एक तरह से बच्चों को दिए जाने वाले शिक्षा के अधिकार का हनन कर रहे हैं। इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 23 नवंबर 2010 को एक नोटिफिकेशन जारी किया था। जिसमें प्राइवेट स्कूलों को अपने दाखिला मानक तय करने की छूट दी गई थी। दिल्ली सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी कर प्राइवेट स्कूलों को यह छूट प्रदान की थी। उच्च न्यायालय ने कहा कि पूरी दाखिला प्रक्रिया रद हो जाएगी, अगर अदालत दिल्ली सरकार द्वारा 15 दिसंबर 2010 को जारी किए गए नोटिफिकेशन को रद कर देती है। इस नोटिफिकेशन में प्राइवेट स्कूलों को छूट दी गई थी कि वे अपनी इच्छा से स्कूल में दाखिला मानक तय कर सकते हैं। उल्लेखनीय है कि नर्सरी दाखिला प्रक्रिया के संबंध में समानता के अधिकार को लेकर अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने एक जनहित याचिका उच्च न्यायालय में दायर की थी। याचिकाकर्ता ने बुधवार को कहा कि निजी स्कूलों ने दाखिलों के लिए अपने अलग-अलग मानक तय कर लिए हैं। इससे दाखिलों में भेदभाव शुरू हो गया। निजी स्कूल मनमानी कर रहे है। वहीं शिक्षा के अधिकार कानून की शिक्षा के अधिकार के सेक्शन 13 में स्पष्ट उल्लेख है कि नेबरहुड मुद्दे को छोड़कर किसी भी बच्चे से दाखिले में भेदभाव नहीं किया जाएगा। यानि हर बच्चे को समान रूप से दाखिला पाने का अधिकार है। खंडपीठ ने उनके तर्को पर सहमति जताते हुए केंद्र व दिल्ली सरकार के अधिवक्ता से कहा सेक्शन 13 में स्पष्ट है कि दाखिलों में भेदभाव नहीं किया जाएगा और सभी को दाखिला लेने का अधिकार है। अत: किसी भी प्राइवेट स्कूल को स्वयं से दाखिला मानक तय करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। खंडपीठ ने याची से भी पूछा कि क्या वे वर्तमान में हो रहे दाखिलों पर भी आपत्ति कर रहे है या नहीं। अग्रवाल ने कहा वर्तमान दाखिलों पर वे आपत्ति नहीं कर रहे क्योंकि अधिकांश दाखिले हो चुके हैं। उन्होंने कहा भविष्य में होने वाले दाखिलों के लिए सरकार दिशा-निर्देश तय करे। उधर, इस मामले में एडिशनल सॉलीसिटर जनरल राजीव मेहरा ने कहा कि इस संबंध में एक मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी विचाराधीन है। भी 15 दिसंबर 2010 को इसी तरह का
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