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नौकरी कर रहे केयू में और मजदूरी िमल रही मनरेगा से
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भास्कर न्यूज | कुरुक्षेत्र
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गांवपिंडारसी के ग्रामीणों ने नौकरी भले ही कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में की है लेकिन उन्हें वेतन केयू और मनरेगा दोनों से मिला है। इस बात का खुलासा सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगी गई जानकारी में हुआ। गांव के ही एक व्यक्ति ने जब सूचना मांगी कि मनरेगा स्कीम के तहत किस व्यक्ति को कितने पैसे दिए गए हैं। इसका जवाब आने पर व्यक्ति चौंक गया। जानकारी में पाया कि जिन लोगों को मनरेगा के तहत मजदूरी का भुगतान किया गया है वे तो केयू में आउटसोर्सिंग के तहत काम पर लगे हुए हैं। ऐसे में उन्हें मनरेगा स्कीम के तहत किस आधार पर पैसे मिले। इतना ही नहीं, आवेदक ने केयू प्रशासन से भी मनरेगा मजदूरी के तहत वेतन पाने वालों की हाजिरी की डिटेल आरटीआई से मांग ली। इसके बाद मामले की शिकायत डीसी और सीएम को भी दी गई है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है। यहमांगी थी सूचना : आरटीआईआवेदक अमर सिंह ने बताया कि उन्होंने सात सितंबर 2013 को पीएनबी बैंक से पिंडारसी गांव के मनरेगा मजदूरों को एक जुलाई 2012 से सितंबर 2013 तक मिलने वाले वेतन की डिटेल मांगी थी। इसका जवाब बैंक से उन्हें 29 सितंबर 2013 को मिला। इसमें उन्होंने देखा कि जिन लोगों को मनरेगा मजदूर दिखाया गया है उनमें से कई लोग तो केयू दूसरी जगहों पर काम करते हैं। इस पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए फरवरी 2014 में केयू प्रशासन से उन ग्रामीणों की हाजिरी की डिटेल मांगी गई, जिन्हें मनरेगा मजदूरी में दिखाकर वेतन दिया गया था। आरटीआई के तहत सूचना मांगने वाले पिंडारसी के अमर सिंह ने आरोप लगाया कि मनरेगा मजदूरी के नाम पर लाखों रुपए का गोलमाल किया गया है। उन्होंने कहा कि आरटीआई के माध्यम से उन्होंने सभी सबूत जुटाए हैं। इसके आधार पर यह साफ है कि जिन ग्रामीणों को मनरेगा स्कीम के तहत मजदूरी दी गई उनमें से कई ग्रामीण केयू में आउटसोर्सिंग के तहत कार्य कर रहे हैं। अमर सिंह ने कहा कि कई अन्य ग्रामीण दूसरे काम कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें मनरेगा मजदूरी में दिखाकर अनुचित लाभ पहुंचाया गया है। |
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